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करम में लिख्या कंकर तो के करै शिवशंकर

एक बूढा और उसकी बुढिया जंगल से लकड़ियाँ लाकर शहर में बेचते और अपने पेट पालते थे। एक दिन जिस रास्ते से वे लकड़ियों का गट्ठर लेकर जा रहे थे, उसी रास्ते से शिव-पार्वती भी गुजर रहे थे। उन दोनों की दशा देख कर पार्वती को बड़ी दया आई। उन्होंने शिवजी से कहा कि इन पर कृपा कर के आप इन्हें धन दे दीजिए। शिवजी ने उत्तर दिया कि इनके भाग्य में धन लिखा ही नहीं है तो मैं कैसे दे दूँ? लेकिन पार्वती नहीं मानीं तो शिवजी ने रुपयों से भरी एक थैली उनकी राह में डालदी।
उधर उन दोनों ने विचार किया कि हम बूढे तो हो गये लेकिन यदि अन्धे भी हो जाएँ तो कैसे चल पाएँगे। इस बात का अनुभव करने के लिए वे दोनों अंधे बन कर चलने लगे और रुपयों की थैली को लांघ कर निकल गये। इस पर शिवजी ने पार्वती से कहा कि देख लो, इनके भाग्य में ही धन नहीं है।

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