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दगा किसी का सगा नहीं, कर के देखो भाई

किसी को धोखा दे कर आप फायदा नहीं उठा सकते, इस आशय की एक कहानी कही जाती है.  

एक पंडित नित्य राजा को कथा सुनाने जाया करता था। एक दिन राजा ने पंडित से कहा कि आज कथा सुनने के लिए मेरे पास अधिक समय नहीं है इसलिये आप मुझे सार रूप में ही कथा सुना दें। पंडितजी सार रूप में दो बातें कह दीं – दगा किसी का सगा नहीं, करंता सो भोगता। राजा उसे सोने की एक मोहर दे दी। फिर जब भी कभी राजा के पास समय नहीं होता तो पंडित उसे यही दो पंक्तियाँ सुनाता और राजा उसे एक मोहर दे देता। यह देख कर राजा के नाई को बड़ी डाह हुई। उसने पंडित का पत्ता काटने की युक्ति सोची और अगले ही दिन उसने पंडित को बरगलाने के लिए कहा कि तुम काहे के पंडित हो? राजा मांस खाता है, शराव पीता है और तुम उसके मुँह में मुँह दिये रहते हो। जब राजा तुमसे बात करता है तो उसके मुँह की हवा तुम्हारे मुंह में जाती है, जिससे तुम्हारा भी धर्म भ्रष्ट होता है। इसलिए कल से मुंह पर पट्टी बांध कर आया करो। पंडित को राज नाई की बात उपयुक्त लगी।

उधर नाई ने राजा से कहा कि महाराज! आपने यह कैसा पंडित रख रखा है? यह तो कहता है कि राजा के मुँह से बड़ी दुर्गन्ध आती है, इसलिए कल से मुँह पर पट्टी बांध कर आया करूंगा। अगले दिन पंडित अपने मुँह पर पट्टी बांध कर आया। यह बात राजा को बड़ी बुरी लगी और उसने पंडित को दण्ड देने का निश्चय कर लिया।
जब पंडित कथा सुना कर जाने लगा तो राजा ने उसे एक की बजाय दो मोहरें दीं और साथ ही उसे एक चिट्ठी भी दी कि यह चिट्ठी अभी कोतवाली जाकर कोतवाल को दे देना। पंडित बाहर निकला तो दरवाजे के बाहर ही उसे नाई मिला। उसने एक मोहर नाई को दे दी और उससे कहा कि यह चिट्ठी तुम कोतवाल को दे आओ। नाई खुश हो गया और चिट्ठी लेकर कोतवाली गया। कोतवाल ने चिट्ठी पढ़ी और नाई को पकड़ कर झट से उसकी नाक काट ली, क्योंकि चिट्ठी में राजा ने कोतवाल के नाम यही आदेश लिखा था कि चिट्ठी लाने वाले की नाक तुरन्त काट ली जाए। इस प्रकार नाई को दगा करने का फल मिल गया।

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