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घर का घर में ही सुलट लिया

एक सियार और सियारी तालाब पर पानी पीने के लिये गये तो उन्होंने तालाव के किनारे एक शेर को बैठे देखा। दोनों बहुत प्यासे थे और प्यास के कारण उनकी जान निकली जा रही थी, इसलिये दोनों ने मिलकर एक युक्ति सोची। सियार को अपने पीछे लेकर सियारी ने शेर के पास जाकर स्त्रियोचित कोमलवाणी में कहा कि जेठजी आप हमारा न्याय कर दीजिये। शेर के पूछने पर सियारी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुये कहा कि हम पति-पत्नी अपना-अपना हिस्सा अलग कर रहे हैं। हमारे तीन बच्चे है, जिनमें से दो को सियार लेना चाहता है। लेकिन मैंने बच्चों को जन्म दिया है, उन्हें कष्ट उठा कर पाला-पोसा है, अतएव मुझे दो बच्चे मिलने चाहिए और सियार को एक।
शेर ने सोचा कि दो तो ये हैं और तीन इनके बच्चे हैं, अतः पांचों को मिलाकर अच्छा नाश्ता हो जायेगा। इसलिये उसने सियारी से कि कहा तू जाकर तीनों बच्चों को यहाँ ले आ, मैं समुचित न्याय कर दूंगा। यह सुनकर सियारी वहाँ से चली और चलते समय पेट भरकर पानी भी पीती गई।
जब कुछ समय बीत गया और सियारी बच्चों को लेकर नहीं लौटी तो सियार ने नम्रता पूर्वक शेर से कहा कि हुजूर लगता है सियारी की नीयत में फर्क है। वह सोचती है कि जंगल के राजाजी कहीं सियार को दो बच्चे न दिलवा दें और इसीलिये वह बच्चों को लेकर यहाँ नहीं आई है। लेकिन मुझे आपसे न्याय की पूरी आशा है, अतः मैं जाकर अभी उन चारों को आपके पास ले आता हूँ। शेर ने आज्ञा दे दी और सियार भी पानी पीकर चलता बना।
कुछ देर तक तो शेर प्रतीक्षा करता रहा। लेकिन जब भूख अधिक सताने लगी तो वह स्वयं ही चलकर सियार की मांद पर आया और दोनों को पुकार कर कहा कि तुम अपने तीनों बच्चों को लेकर शीघ्र या जाओ, मैं अभी तुम्हारा न्याय कर देता हूँ। शेर की बात सुनकर दोनों मन ही मन हँसे और सियारी ने मांद के अन्दर से ही जवाब दिया – जेठजी, हम ने तो अपने घर में ही सुलटा लिया है। सियार दो बच्चे मांगता है तो इसे दो दे दूँगी और मैं एक पर ही सन्तोष कर लूंगी। आपने यहाँ तक ग्राने का कष्ट व्यर्थ ही किया, अब आप भले ही सिधार जाएँ।
सियारी की बात सुनकर शेर अपना सा मुँह लेकर चला गया।

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