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क्या कहूँ कछु कहा न जाए, बिन कहे भी रहा न जाए

एक बार एक राजा शिकार खेलते समय अपने दल से अलग हो कर कहीं जंगल में भटक गया. राजा भूख प्यास से बेहाल था और ऊपर से जंगली जानवरों और डाकुओं का डर भी था. ऐसे में एक चरवाहे ने पानी पिला कर और रास्ता दिखा कर राजा की जान बचाई. राजा बहुत खुश हुआ और उस ने एक पत्ते पर सात गाँव का पट्टा लिख कर उसे दे दिया. चरवाहा ख़ुशी ख़ुशी अपने घर आया और यह बताने के लिए उस ने सब लोगों को इकठ्ठा किया. तब तक उसकी निगाह बचते ही उसकी बकरी पत्ते को खा गई. तब उस ने रोते हुए कहा – क्या कहूँ कछु कहा न जाएबिन कहे भी रहा न जाएमन की बात मन में ही रहीसात गाँव बकरी चर गई. किसी को अप्रत्याशित रूप से बहुत बड़ा नुकसान हो जाए तो यह कहावत कही जाती है.

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