टेसू

झांझी

दशहरे से पहले नवरात्र में छोटे लड़के तीन खपच्चियों पर टेसू का शीश सा बनाकर टोलियों में घर घर घूमते हैं और पैसे माँगते हैं। छोटी लड़कियाँ एक छेदों वाली छोटी मटकी में दिया जलाकार टेसू की पत्नी झाँझी के नाम पर पैसे माँगती हैं। टेसू गीतों में बेसिरपैर की तुकबन्दी सी होती है जबकि झाँझी के गीत गम्भीर होते हैं। शरद पूर्णिमा की रात को जमा किए गए धन से टेसू की बारात निकाली जाती है। उधर लड़कियाँ भी जमा किए गए धन से झाँझी के विवाह की तैयारी करती हैं। किसी सार्वजनिक स्थान पर धूमधाम से टेसू और झाँझी का विवाह कर दिया जाता है। और फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता है.

टेसू का नाता महाभारत से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि टेसू जिनका वास्तविक नाम बर्बरीक था, भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र थे. वे परमवीर थे और महादानी थे.  उन्होंने अपनी मां को वचन दिया था कि महाभारत में जिस किसी की सेना हार रही होगी वह उस की ओर से युद्ध लड़ेंगे.
भगवान श्रीकृष्ण को पता था कि अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ेंगे तो वह 1 दिन में ही महाभारत युद्ध समाप्त कर देंगे और पांडवों की हार होगी. इसलिए उन्होंने साधु का भेष रखकर बर्बरीक से उनका सिर मांग लिया. बर्बरीक ने भी अपना सिर भगवान को अर्पित कर दिया. लेकिन उन्होंने इच्छा जाहिर की कि उन्हें महाभारत का युद्ध देखना है. इसलिए बर्बरीक के सिर को तीन डंडियों के सहारे पर्वत पर रख दिया, जहां से उन्होंने पूरी महाभारत देखी. भगवान कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि  कलयुग में खाटू श्याम के नाम से उनकी पूजा की जाएगी. टेसू के विषय में और अधिक जानकारी पढ़िए लेख के अंत में –

 

1. आगरे को जाएँगे, चार कौड़ी लाएँगे

(पारम्परिक टेसू की आँखों और नाक तथा इसके मुख के स्थान पर कौड़ी चिपकाई जाती है। अतः चार कौड़ियों की आवश्यकता होती है। बाद में ये कौड़ियाँ सँभालकर रख ली जाती हैं क्योंकि इनको शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।)
आगरे को जाएँगे, चार कौड़ी लाएँगे
कौड़ी अच्छी हुई तो, टेसू में लगाएँगे,
टेसू अच्छा हुआ तो, गाँव में घुमाएँगे,
गाँव अच्छा हुआ तो, चक्की लगबाएँगे,
चक्की अच्छी हुई तो, आटा पिसवाएँगे,
आटा अच्छा हुआ तो, पूए बनवाएँगे,
पूए अच्छे हुए तो, गपगप खा जाएँगे,
खाकर अच्छा लगा तो बाग घूमने जाएँगे,
बाग अच्छा हुआ तो, माली को बुलाएँगे,
माली अच्छा हुआ तो, आम तुड़वाएँगे,
आम अच्छे हुए तो, घर भिजवाएँगे,
घर भिजवाकर, अमरस बनवाएँगे,
अमरस अच्छा हुआ तो, आगरे ले जाएँगे।
आगरे को जाएँगे, चार कौड़ी लाएँगे—

2. टेसू रे टेसू घंटार बजइयो

टेसू रे टेसू घंटार बजइयो,
इक नगरी दो गाँव बसइयो,
बस गए तीतर, बस गए मोर,
फिरत चमारिया लै गए चोर,
चोरन के घर खेती हुई,
खाय चमरिया मोटी हुई,
मोटी है कै मायके आई,
माय कहै मेरी लाड़ो आई,
सिर के बाल कहाँ धर आई।

3. टेसू रे टेसू घंटार बजाना

टेसू रे टेसू घंटार बजाना, इक नगरी दस गाँव बसाना।
उड़ गए तीतर रह गए मोर, गबरू बैल को ले गए चोर,
चोरों के घर खेती हुई, खाके चोरनी मोटी हुई,
मोटी होके मायके आई, देख हँसे सब लोग लुगाई,
गुस्सा होके पहुँची दिल्ली, दिल्ली से लाई दो बिल्ली,
एक बिल्ली कानी, सब बच्चों की नानी,
नानी नानी टेसू आया, संग में अपने झाँझी लाया,
मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
दही बड़ा हो हइया, झट निकाल रुपइया,
रुपए के तो ला अखरोट, मुझको दे दे सौ का नोट।

4. मेरा टेसू यहीं खड़ा

मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
दही बड़ा बहुतेरा, खाने को मुँह टेढ़ा
आगरे की हाट में
आगरे की हाट में जाटनी बिहार की,
झुमके उसके लाख के तो नथनी हज़ार की
बैठ के अपने रंगमहल में ढोलकी बजाती,
ढोलकी की तान अपने तोते को सुनाती
तोता बैठा रेल में तो मैना भी संग में चढ़ी,
सीटी मार के धुआँ उड़ाती रेल फ़ौरन चल पड़ी
रेल के पहले ही डिब्बे में टेसू जी थे खड़े हुए,
तीन टाँग और काली टोपी जिसमें लड्डू पड़े हुए
लड्डू पेड़े खाने वाले काले हैं कल्यान जी,
दूध दूधिया पीने वाले गोरे हैं मलखान जी
लाल सिंदूर लगा लंका में कूद पड़े हनुमान जी,
जय बोलो सीता मइया की लंका जीते राम जी।

5. टेसू आए बानवीर

टेसू आए बानवीर, हाथ लिए सोने का तीर,
एक तीर से पत्ते झाड़े, कान्हा जी देखत रहे ठाड़े
कान्हा जी की बन्सी बाजी, राधा छून छनाछन नाची,
एक घुँघरू टूट गया, दूध का मटका फूट गया
या तो जल्दी मटका जोड़ो, या फिर अपना बटुआ खोलो,
रुपया धेली जो कुछ हो, टेसू बीर के नाम पे दो।

(उपरोक्त गीत बर्बरीक की उस कथा पर आधारित है जिसमें उनहोंने एक ही बाण से पेड़ के सारे पत्तों में छेद कर दिया था)

6. मेरा टेसू यहीं अड़ा

मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
सूख गया मेरा टेसू, एक टाँग पर खड़ा खड़ा
टेसू को लोमड़ी काट गई, दद्दू की हँडिया चाट गई,
हँडिया रखी थी खटिया पे, दद्दू की खटिया घाट गई,
खटिया बड़ी के दद्दू बड़ा, मेरा टेसू यहीं अड़ा।

7. एक पिटारा हमने खोला

एक पिटारा हमने खोला, उसमें से निकला भप्पू गोला,
भप्पू गोले को दिया तमाचा, कठपुतली बनकर वह नाचा
कठपुतली ने गाड़े खूँट, बँधे मिले उनमें सौ ऊँट,
उन ऊँटों पर हुई सवारी, राह में मिल गई सड़ी सुपारी
सड़ी सुपारी को जब काटा, उसमें से निकला नौ मन आटा,
नौ मन आटे की बनाई रोटी, उसमें से निकली झाँझी छोटी
झाँझी ने जब घूँघट खोला, पीछे से यों टेसू बोला,
महाभारत की रेलमपेल, मैंने देखा सारा खेल
कहता हूँ डंके की चोट, फौरन दे दो सौ का नोट।

 8. चन्दा दे दो, चन्दा दे दोचन्दा दे दो, चन्दा दे दो

मेंढक बोले टर्री टर्री, नाई की मूँछें हरी हरी,
गाय की पूँछ पे धान उगा, गाय ने किसकी मूँछ चरी,
अजी मूँछ बड़ी के नाई बड़ा, मेरा टेसू यहीं अड़ा।
चन्दा दे दो, चन्दा दे दो …

9. टेसू राजा बीच बाज़ार

टेसू राजा बीच बाज़ार, खड़े हुए ले रहे अनार
इस अनार में कितने दाने? जितने हों कम्बल में खाने
कितने हैं कम्बल में खाने? भेड़ भला क्यों लगी बताने
एक झुंड में भेड़े कितनी? एक पेड़ पर पत्ती जितनी
एक पेड़ में कितने पत्ते? धोबी के घर जितने लत्ते
धोबी के घर कितने लत्ते? जितने कलकत्ते में कुत्ते
बीस लाख तेईस हज़ार, दाने वाला एक अनार
टेसू राजा कहें पुकार, लाओ मुझको दे दो चार

10. लौकी बक लौक चचेड़ा

लौकी बक लौक चचेड़ा, लौकी ऊले बांस बसेड़ा
ऊलत ऊलत कहाँ गई, धुबनिया के टोला
अरी धुबनिया चोर आयो, केतो गयो केतो आयो
आज जो मेरो धोबी होतो, मार लकड़ियाँ ढेर कर देतो

11. टेसू हो तुम वामन वीर

टेसू हो तुम वामन वीर,
हाथ लिये सोने का तीर
बजरंग बेटा खड़ा निशान,
बाएँ हाथ चला पहिचान
हरे बाग मा डेरा परिगा,
सब लोगों ने पूँछी बात
कितना लोग तुम्हारे पास,
अस्सी पियादे, नौ असवार

12. मेरा टेसू यहीं अड़ा

मेरा टेसू यहीं अड़ा
खाने को माँगे दही बड़ा
दही बड़े ने पूछी बात
कह दे बेटा मन की बात
आगरे के टेकरे से
लड़की सुनार की
उसके भूरे-भूरे बाल
उसकी नथनी हजार की
सोने के कान फूल
सोने की आरसी
महल बैठी ढोलकी बजाती
ढोलकी की तान अपने यार को सुनाती
यार का दुपट्टा सारे शहर की निशानी
माँगो रे लड़को आई दीवाली
रेल चली है खटके से
चवन्नी निकालो मटके से

13. टेसू आए घर के द्वार

टेसू आए घर के द्वार।
खोलो रानी चंदन किवार।
टेसू की मर गई नानी,
नानी बड़ी सयानी।
नानी की थी बिल्ली,
बिल्ली बड़ी चिबिल्ली।
बिल्ली खाए बर्फी, बर्फी में लगी पन्नी,
दे दो एक चवन्नी॥

14. इमली की जड़

इमली की जड़ से निकली पतंग, नौ सौ मोती नौ सौ रंग
एक रंग मैंने माँग लिया, दिल्ली जाय पुकार किया
दिल्ली से आया काला कोट, मार सिकंदर पहली चोट
कोट चोट चूल्हे की ओट, चूल्हा माँगे सौ का नोट
(जिससे माँगा जा रहा है वह भी बड़ा बेशरम है, वह कहता है) –
चूल्हे में मारूँ धक्का, जाय पड़े कलकत्ता
बिल्ली का सा बच्चा, मैं तेरा चच्चा, चल भाज यहाँ से

15. टेसू जी अगड़ करें

(जब कई गीत गाने के बाद भी किसी घर से कुछ न मिले तो चिल्ला चिल्लाकर ऐसा कुछ गाते हैं)
टेसू जी अगड़ करें, टेसू जी बगड़ करें, टेसू जी तो लैई के टरें
पक्की ईंट का बंगला, इसमें रहवै कंगला,
घर घर जाओ माँग के लाओ, जल्दी ला इस कंगले को खवाओ

 

उत्तर प्रदेश के आगरा व आस पास के क्षेत्रों में नवरात्र समाप्त होते ही दशमी से पाँच दिन तक टेसू-झाँझी का त्यौहार शुरू हो जाता है.  पूर्णमासी के दिन टेसू और झाँझी का विवाह करा कर उनका विसर्जन कर दिया जाता है. हालांकि अब टेसू और झाँझी परंपरा को लोग भूल चुके हैं.

आजकल की पीढ़ियाँ इस विषय में कुछ नहीं जानतीं लेकिन चार पाँच दशक पहले बड़ी शान से टेसू-झाँझी का खेल खेला जाता था. टेसू -झाँझी के लोकगीत भी उस समय खूब गाए जाते थे.  गांव देहात में छोटे बच्चे घर-घर जाकर टेसू के गीत गाते थे और साथ ही अनाज और रुपया इकट्ठा करते थे. उस वक्त छोटे छोटे टेसू के अलावा 5 से 6 फुट तक के टेसू चलन में थे. लोंगो में सबसे बड़ा टेसू खरीदने की होड़ लगती थी. आधुनिकता के चलते शहरों में खासकर बड़े घरों में यह परम्परा बिलकुल समाप्त हो चुकी है. हो सकता है गांव देहात में कहीं ये परम्परा जिंदा हो.

यह किसी को नहीं मालूम कि टेसू और झांझी के विवाह की लोक परंपरा कब से पड़ी पर इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह परंपरा महाभारत के बीत जाने के बाद प्रारम्भ हुई होगी. एक ऐसी प्रेम कहानी जो युद्ध की दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई.
कानपुर से लेकर झांसी तक और कानपुर से उरई होते हुए इटावा तक और बृजभूमि से राजस्थान के कुछ गांवों में होती हुई मुरैना में यह प्रथा घुसती है और भिण्ड होते हुए बुंदेली धरती पर परंपरागत रूप से टेसू गीत गूंजने लगते थे. कहीं बाकायदा कार्ड छपवाकर लोगों को नेह निमंत्रण दिया जाता था तो कहीं बैंड बाजा के साथ बरात पहुंचती थी और टेसू का द्वारचार के साथ स्वागत किया जाता था.

एक दौर था जब गांव में छोटे छोटे बच्चे – बच्चियां टेसू-झांझी लेकर घर-घर से निकलते थे और गाना गाकर चंदा मांगते थे. हर साल कोई एक परिवार झांझी के लिए जनाती बनता था और एक परिवार टेसू की तरफ से बराती. मान्यता थी कि इस विवाह के बाद अन्य वैवाहिक कार्यक्रमों में कोई अड़चन नहीं आती. शरद पूर्णिमा की रात में मनाए जाने वाले इस विवाह समारोह में महिलाएं मंगलगीत गाती थीं. किवदंती हैं कि भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत का युद्ध देखने आते समय झांझी से प्रेम हो गया. उन्होंने युद्ध से लौटकर झांझी से विवाह करने का वचन दिया था.

दशहरा मेला में लड़कियां झांझी और लड़के टेसू के नाम की मटकी खरीदकर लाते थे. झांझी को कन्या के रूप में और टेसू को राजा के रूप में रंग कर मटकी में अनाज भर कर एक दीया जलाते थे और घर घर जाकर अनाज और धन इकट्ठा करते थे. वयस्क लोग बच्चों को इस आयोजन में खुले दिल से सहयोग करते और विवाह की रात पूरा साथ देते थे. यह एक सामजिक सद्भाव का पर्व था. हर घर का अनाज और पैसा मिलकर एक हो जाता था. न कोई ऊंचा न कोई नीचा. लड़कियों को भी उतना ही सहयोग दिया जाता था, जितना लड़कों को.
हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार लड़के थाली-चम्मच बजाकर टेसू की बारात निकालते थे. वहीं लड़कियां भी शरमाती-सकुचाती झिंझिया रानी को भी विवाह मंडप में ले आती थीं. फिर शुरू होता था ढोलक की थाप पर मंगल गीतों के साथ टेसू-झांझी का विवाह. सात फेरे पूरे भी नहीं हो पाते और लड़के टेसू का सिर धड़ से अलग कर देते. झांझी भी अंत में पति वियोग में सती हो जाती और रात में ही उन्हें गणेश प्रतिमाओं की तरह गंगा में विसर्जित कर दिया जाता.

झांझी को  बनाने के लिए  एक मटकी को लेकर उसके बीच में चारों ओर गोल-गोल छेद कर लिये जाते हैं. मटकी (गगरी) में चूना पोतकर उस पर सुंदर चित्रकारी की जाती है, फिर उसके अंदर सरसों के तेल का दीपक जलाकर रखा जाता है. टेसू बाँस की तीन खपचियों के सहारे लड़के खुद बना लेते हैं या बाजार से खरीद लेते हैं. कई जगह हुक्का पीते, तलवार चलाते टेसू बनाए जाते हैं.

झेंझी की एक कथा में कहा गया है कि सुआटा नामक एक राक्षस किशोरी कन्याओं को उठा ले जाता था। उसी के अत्याचार से परेशान हो कर कर कन्याओं ने माँ गौरी की आराधना की। माँ गौरी ने सुआटा राक्षस का वध करने के लिए एक वीर युवक टेसू को भेजा, जिसने दैत्य सुआटा का वध करके उसकी पुत्री झुँझिया से विवाह कर लिया। शारदीय नवरात्र में लड़कियाँ गोबर से सुआटा राक्षस की प्रतिमा बनाती हैं, बाद में झुँझिया का विवाह होता है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कथाएँ व गीत प्रचलित हैं।